पिता पुत्र संवाद

पिता पुत्र संवाद

पिता ने पुत्र के चरण स्पर्श किए , और कहा – क्या आज्ञा है मेरे लिए 

पुत्र ने कहा – हे चिरंजीव बाप ,

उससे पहले की आपसे शुरू करूँ वार्तालाप ,

एक बीड़ी पिलवाइए , पाँव जरा धीरे दबाइये ,

मन के नहीं मेरे पाँव हैं ,

पिता ने पुत्र की बीड़ी सुलगाई , खुद भी खेंच के ऐसी दम लगाई ,

कि बीड़ी के प्राण पखेरू उड़ गए , बेटे के होंठ मारे गुस्से के सिकुड़ गये 

बाप से बोला – बदतमीज , तू बाप है या फजीता है 

बेटे के सामने बीड़ी पिता है ,

अबे जोरू के गुलाम ,

यूँ ही रोशन करेगा बेटे का नाम ,

क्या जमाना आ गया है ,

बाप बेटे के सामने बीड़ी पिये ,

शर्मदार बेटा कैसे जिये ,

बेटा पिये तो कोई बात नहीं 

दमे का मरीज   है ,ये भी कोई बाप के पीने की चीज है ,

क्यो बे ,कलयुग का प्रभाव तुझ पर भी पड़ गया 

हर हसीन  बुढ़िया से इश्क लड़ाता  है ,

रीडकस्न का माल बहुत भाता है ,

अब यदि किसी बुढ़िया को प्रेम पत्र लिखा ,

मोहल्ले के आवारा बापो केआर साथ दिखा ,

तो बेटा ऐसा टार्चर पहुंचाऊंगा,

तेरी हर प्रेमिका से , मै खुद इश्क लड़ाऊगा,

अबे कैसे सीधा -साधा बनके बैठा है ,

जैसे कुछ जानता ही नहीं ,हर गृहस्थी का सबक याद किया ,

या माँ को बुलाऊ ,माँ भी क्या करेगी ?

ये मास्टर जी भी हराम की खाते है 

इन बापो को जाने कैसा पढाते हैं ,

हम भी सोचते हैं हटाओ रोज – रोज कौन धमकाये ,

ले दे के एक ही बाप है , खेलने खाने के दिन है , खाये 

मगर बेटे का मर्यादा तो निभाए ,

हद हो गई हमारी नरमी की ,

आटा घोलकर पिये जा रहे हैं ,

मगर बचो को जन्म दिये जा रहे हैं ,

मंदिर मे सोते हैं राम जाने इनके बच्चे कैसे होते हैं ?

बोलो तो डांटता है  चुप रहो ,

पिता पुत्र संवाद

बच्चो का जन्मदाता तो भगवान है , इसमे हमारा क्या योगदान है ,

ये बोल – बोल कर घर भर दिया ,

अपने साथ भगवान का भी चरित्र खराब कर दिया ,

वह तो अच्छा हुआ , पहला इश्क कामयाब नहीं हुआ ,

सीन कुछ दिन बाद ड्राप होता ,

तो आधे हिंदुस्तान का बाप होता ,

सुबह शाम खाते हैं झिड़की 

मगर जब भी खुलती है सामने की खिड़की ,  जरूर देखते हैं ,

मेरा यार छुप – छुप कर ऐसी मस्करी करेगा  ,

हाजी मस्तान भी क्या तस्करी करेगी ,

रोज सब्जी लेने जाते हैं , और एक बच्चे को बेचकर आते हैं ,

मंहगाई का ये हाल है , उस पर ये कमाल है ,

 आज कल कविता करते हैं ,

नायिका के नख -शिख के वर्णन पर आहे भरते है 

कहते है -हे कोमलकान्त पदावली ,

तेरे सारे पुर्जे मिल गए ,मगर कमर नहीं मिली ,

खुद लापता है कगार कमर की तलाश है ,

आजकल का बाप भी कितना बदमाश है ,

अबे सावन के अंधे ,यथार्थ के धरातल पर आ ,

फिर कल्पना की वादियो मे जा लेटा ,

बाप ने कहा बेटा ,

इस इक्कीसवी सदी की नालायक सभयता का त्रास हूँ ,

दुर्भाग्य से तू मेरा बेटा ,और सौभाग्य  से मै तेरा बाप हूँ ,

अतीत हमेशा वर्तमान से हारा है ,

शेख मुजीब को हमेशा उसके बेटो ने मारा है |

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